Thursday, September 20, 2012

आंदोलन का डेथ सर्टिफिकेट


आंदोलन का डेथ सर्टिफिकेट

यह तो होना ही था। 19 सितंबर को टीम अन्ना के विघटन की औपचारिक घोषणा हो गई। यूं कहें कि एक संभावनाशील आंदोलन की मौत का प्रमाण- पत्र जारी कर दिया गया। इस आंदोलन की मौत जंतर मंतर से 'राजनतीक विकल्प' के ऐलान के साथ ही हो गई थी. गोया ये आंदोलन टीम अन्ना के हिसार कूच के बाद से ही बीमार हो गया था। जो सूजन थी;  जानकार उससे चिंतित थे, लेकिन अरविंद और किरण बेदी उसे मोटापा कह रहे थे। अन्ना हजारे भी इससे बेखबर रहे। दरअसल अब तक वैरागी का जीवन जी रहे अन्ना हजारे अपने इस नए परिवार के मोह-पाश में इस कदर जकड़े रहे  कि पड़ोसियों की अच्छी सलाह भी उन्हें उनकी जलन (इर्ष्या) नजर आती रही।
बहरहाल.. देर से ही सही अन्ना और अरविंद के रिश्तों का सच उजागर हो चुका है। अन्ना ने केजरीवाल को उनकी राजनीतिक पार्टी के गठन के लिए शुभकामनाएं दी है। लेकिन अपना नाम और तस्वीर लगाने से मना कर दिया है। वैसे भी अरविंद के सिपाहिय़ों ने 'मैं भी अन्ना' की जगह मैं भी केजरीवाल की टोपी पहले ही पहन ली थी.. हां वो अब अन्ना को 'टोपी' नहीं पहना सकेंगे।
रामलीला मैदान और जंतर मंतर पर किलाकारियों के साथ तिरंगा लहराने वाली किरण बेदी भी अब केजरीवाल के साथ नहीं हैं। किरण बेदी की अन्ना के साथ भी रहने की उम्मीद नहीं हैं. इस पूर्व आईपीएस अधिकारी की अपनी महत्वाकांक्षा हैं। दिल्ली पुलिस की टोपी उतरने के बाद से ही वो भगवा टोपी पहनने के फिराक में हैं। कुछ लोगों का तो ये भी आरोप है कि इन्हीं दोनों ने अपनी-अपनी महात्वाकांक्षा के लिए सरकार और अन्ना में लोकपाल पर समझौता नहीं होने दिया। बहरहाल अन्ना हजारे ने टीम के बिखरने को दुर्भाग्यपूर्ण कहा है। उन्होंने इसके लिए बहुत हद तक जिम्मेवार अरविंद केजरीवाल पर हलमा करते हुए कहा  कि अगर जनता का भारी समर्थन राजनीतिक दल के गठन के पक्ष में था तो फिर ये बैठक बुलाई ही क्यों गई
खास बात ये है कि अब तक जिन आंकड़ों पर अन्ना समेत पूरी टीम इठलाती रही, अन्ना हजारे ने उन्हें ही खारिज कर दिया. उन्होंने  इंडिया एगेंस्ट करप्शन की ओर से कराए गए जनमत सर्वेक्षण को भी निरस्त कर दिया और कहा कि मुझे फेसबुक, इंटरनेट के माध्यम से कराए गए सर्वेक्षण पर भरोसा नहीं है।    

अन्ना के बयान से सोशल साइट्स के दीवानों को भी ठेस लगी होगी। विघटित टीम के सदस्यों ने भी अब अन्ना को कोसना शुरू कर दिया है। इनका कहना है कि दिल्ली के लोगों ने अन्ना की छवि को उभारा। कुछ लोग तो यहां तक आरोप लगा रहे हैं कि अन्ना ने नई तकनीकी से लैस इस टीम का इस्तेमाल किया है। ये तो शुरुआत है.. अब रास्ते अलग-अलग हैं तो आरोप-प्रत्यारोप लगेंगे ही. छह महीने बाद ऐसा होगा कि दोनों एक दूसरे का मजाक उड़ाते नजर आएंगे.  
 एक बात और ध्यान देने योग्य है कि अन्ना ने इस विघटन के तुरंत बाद बाबा रामदेव से मुलाकात की..बाबा रामदेव ऐसे नवधनाढ़यों के प्रतिनिधि हैं,,जो योग की ओर मुखातिब हैं। या तो रोग की वजह से या फिर टशन के लिए। बाबा का संघ प्रेम जगजाहिर है. ऐसे में बाबा रामदेव से अन्ना हजारे की नजदीकियां फिर आशंकाओं को जन्म देती हैं। किरण बेदी भी बाबा रामदेव के पक्ष में दिखाई देती हैं। जो दिल्ली में बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ना चाहती हैं।. ऐसे में अन्ना हजारे अगर रानजीतिक पार्टी बनाने के आरोप में केजरीवाल से किनारा करते हैं तो उन्हें बाबा के कदमों से भी सावधान रहना चाहिए.
बहरहाल..अन्ना हजारे का ये रूख अरविंद केजरीवाल को चौंकाने वाला लग रहा है. हालांकि वो निराश नहीं हैं. अन्ना के आदर्शों पर पार्टी बनाना चाहते हैं। उन्होंने कहा है कि देश कठिन दौर से गुजर रहा है. देश बिक रहा है, उनसे जो बन पड़ेगा वो करेंगे। 

Wednesday, September 19, 2012

4th Dimension





सूचना क्रांति, सूचनाओं का विस्फोट, सूचना युग...मौजूदा दौर को इस तरह के तमाम विशेषणों से नवाजा जा रहा है।.   समाचार माध्यमों में समाज, सियासत, संस्कृति, साहित्य, सिनेमा से जुड़ी सूचनाओ की भरमार है। इन समाचारों के सामजिक सरोकार क्या हैं, समाज पर इसका क्या प्रभाव होता है. इन पर खूब बहस होती है।  बावजूद इसके जन सरोकार से जुड़े कई ऐसे मुद्दे और खबरें हैं, जो कैमरे और खबरनवीसों की नजरों से ओझल हो जाते हैं। आमतौर पर टीवी चैनलों पर समाचारों का चयन टीआरपी क मद्देनजर किया जता है।  इसमें प्रोफाइल और विजुअल की खास भूमिका होती है। ऐसे में जनसरोकार से जुड़े बहुत सारे मुद्दे छूट जाते हैं. । हमारी कोशिश उन अनछुए पहलुओं पर फोकस करने की होगी. हमारा मकसद इस बौद्धिक जुगाली में उन्हें भी शामिल करना है जो अब तक वंचित हैं, उपेक्षित हैं। 


  

      मीडिया के संदर्भ में आमतौर पर कहा जाता है कि ये लोकतंत्र का चौथा खंभा है। लोकशाही की इमारत विधायिका, न्याय पालिका, कार्यपालिका और मीडिया पर टिकी हुई है। मतलब मीडिया की भूमिका बाकी तीनों के बराबर है। लेकिन आज मीडिया का रोल इससे आगे भी है. मीडिया जम्हूरियत के इन हिस्सों की ख़बर भी लेता है.. इसीलिए ये है डेमोक्रेसी का  4th Dimension