Thursday, October 11, 2012

व्यवस्था का बलात्कार



हरियाणा में एक और बलात्कार। पीड़ित दलित समुदाय से। इस तरह के समाचार लगातार मिल रहे हैं। ये सवाल आब आम हो गया है कि आखिर वहां हो क्या गया है। सवाल पूछने वालों में से कुछ के भाव संजीदा हैं। कुछ चटकारे लेने के अंदाज से पूछते हैं। बहरहाल हकीकत ये है कि वहां नया कुछ नहीं हुआ। वही लोग। वही पुलिस ।वही सरकार। वही व्यवस्था। वही सोच।  फिजा में कोई बदलाव नहीं। हां, मीडिया का ध्यान इन वारदातों की ओर जरुर गया है। जब मीडिया में खबरें आने लगी हैं, तो थाने में मामले दर्ज भी होने लगे हैं। ये बात और है कि ये अब तक मुद्दा नहीं बना है।
मुद्दा बने भी तो कैसे। महिला आयोग के लिए ये मुद्दा इसलिए नहीं है कि पीड़ित लो प्रोफाइल के लोग हैं। एससी-एसटी आयोग खानापूर्ति करने के लिए मजबूर हैं। क्योंकि इसके अध्यक्ष सत्तारुढ़ दल के नुमाइंदे हैं। आलाकमान को नाराज नहीं कर सकते। आलाकमान का दौरा होता है। वो भी रस्म अदायगी। पीड़ितों को मरहम लगाने के बदले बयानों का जख्म देकर जवाबदेही पूरी। बोलीं- देश भर में ऐसी घटनाएं होती रहती हैं। आज कल हर वारदात पर बयान देने को आतुर बाबा रामदेव ने ऐसी प्रतिक्रिया दी, जिसकी चर्चा भी मुनासिब नहीं। उनके बयानों में व्यक्तिगत कुंठा ज्यादा दिखा। किसी महिला के प्रति सहानुभूति कम विपक्ष के लोग सियासी नफा-नुकसान का हिसाब लगाने में मशगूल। 
 ओम प्रकाश चौटाला ने साफ कहा कि रेप कम करने के लिए शादी की उम्र घटा दो। हालांकि बाद में वो किंतु-परंतु लगाते दिखे। अब उन्हें ये कौन बताए कि पीड़ितों में किसी की उम्र छह साल है तो किसी की 40 साल भी। कोई कहता है कि 90 फीसदी महिलाएं ऐसे केस में सहमत होती हैं। अब भला ऐसे लोगों को बलात्कार की परिभाषा कौन समझाएँ। अगर समहति है तो फिर बलात्कार कैसे
हम लोगों की आदत हो गयी है कि हम हर मसले का सियासी समाधान ढूंढ़ते हैं। भले ही मसला सामाजिक हो या सांस्कृतिक। हरियाणा में दलितों की जो स्थिति है वो किसी से छुपी नहीं है। नारों में नं. 1 हरियाणा जरुर हो सकता है लेकिन सामाजिक संतुलन के हिसाब से यहां की स्थिति बदतर है। ऊंच-नीच का फासला बहुत लंबा है। समृद्ध और दबंग किस्म के लोग दलितों के जर जोरु और जमीन पर अपना नैसर्गिक अधिकार समझते हैं. उनकी आबरू से खेलना इनके लिए शगल है। बलात्कार की घटनाएँ पहले भी होती रही हैं। अब भी हो रही है। शायद आगे भी होती रहेगी। इसलिए मौजूदा व्वस्था में ये कोई मुद्दा नहीं है। खाप पंचायतें जो खुद को समाज और संस्कृति के ठेकेदार  समझती हैं, उनके लिए बलात्कार कोई मसला नहीं असल मसला शादी के तरीके और उम्र है।
   बहरहाल, हरियाणा में बलात्कार की जो वारदातें हो रही हैं दरअसल ये हमारे सामजिक ताने-बाने की पोल खोल रही हैं। हम राजनीतिक सुधार और आर्थिक सुधार की बातें तो करते हैं..लेकिन जो हमारा आधार है उसमें सुधार की चर्चा नहीं करते। हम अभी भी सामंती सोच से बाहर नहीं आ रहे। जब तक ये समाज महिला, दलति और वंचितों के अस्तित्व को नहीं समझेगा तब तक ऐसी घटनाएँ सामने आती रहेगी। ये घटनाएं अखबार और मीडिया की सुर्खियां बन कर फिर शांत हो जाएंगी। लोक-लाज के नाम पर महिलाएं खुदकुशी करती रहेंगी।ये सिलसिला तब तक जारी रहेगा जब तक हम मूक दर्शक बने रहेंगे.

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